शरद यादव

जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के पूर्व राज्यसभा सांसद शरद यादव ने उनकी सदस्यता समाप्त किए जाने के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी है। शरद यादव ने राज्यसभा सभापति के फैसले को चुनौती देते हुए कहा है कि उनका पक्ष सुने बिना ही उनकी सदस्यता रद्द कर दी, जोकि पूरी तरह गलत है। राज्यसभा सभापति वेंकैया नायडू ने चार दिसंबर को शरद यादव व अली अनवर की सदस्यता रद्द कर दी थी।

बिहार में जनता दल के नेता व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जुलाई में राजद व कांग्रेस के साथ महागठबंधन तोड़कर भाजपा से हाथ मिला लिया था। इसके बाद शरद यादव व उनके गुट के नेता विपक्ष से मिल गए और उनके कार्यक्रमों में हिस्सा ले रहे थे।

राज्यसभा के सभापति ने जदयू के उस तर्क से सहमति जताई थी कि शरद यादव व अनवर ने पटना में विपक्षी दलों की रैली में हिस्सा लेकर स्वेच्छा से अपनी सदस्यता छोड़ी है। पार्टी के निर्देशों के मुताबिक, उन्हें ऐसा नहीं करना था। जदयू ने इस आधार पर उन्हें अयोग्य घोषित कर राज्यसभा की सदस्यता रद्द करने की मांग की थी।

राज्यसभा के लिए शरद यादव का 2016 में चुनाव हुआ था और उनका कार्यकाल 2022 तक था। अली अनवर का कार्यकाल अगले साल पूरा होने वाला था। शरद यादव की ओर से याचिका दायर करने वाले अधिवक्ता निजाम पाशा का कहना है कि नीतीश या शरद में से कौन-सा गुट असली जदयू है, यह मुद्दा कोर्ट में विचाराधीन है और इसका फैसला जल्द हो जाएगा।

जानकारों के मुताबिक, आम तौर पर ऐसे विवादित मामलों को संसदीय समिति के सुपुर्द किया जाता है। समिति इसकी पड़ताल और सभी पक्षों को सुनने के बाद सिफारिश देती है। उसके बाद सभापति निर्णय लेते हैं।

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